gupt samrajya ko bharat golden yug kyu kaha jata hai

Gupt samrajya ko bharat ka golden yug kyu kaha jata hai ?

प्रश्न – गुप्त साम्राज्य  को भारतीय इतिहास के स्वर्ण युग कहा जाता  है विस्तार  से समझाइए ।

गुप्त साम्राज्य को  भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग कहा जाता है ।   (gupt

samrajya ko bharat ka golden yug kyu kaha jata hai ) गुप्त काल में साहित्य , विज्ञान

संस्कृति , स्थापत्य , मूर्तिकला आदि क्षेत्रो में गुप्त काल अन्य कालों से अग्रणीय था,

गुप्त काल के इतिहास को जानने के लिए बिभिन्न स्रोत है । जिसमें साहित्यिक स्रोत , अभिलेख

एवं वीदेशी यात्री का वर्णन प्रमुख है ।

कुछ साहित्यिक ग्रंथ में बिष्णु पुराण , मत्स्यपुराण , वायु पुराण  प्रमुख है । जैन ग्रंथ हरिवंश

पुराण और बौद्ध ग्रंथ वसुबंधी चरित के द्वारा गुप्त काल की जानकारी मिलती है ।

स्मृतियों में पारशर , नारद की स्मृतियाँ प्रमुख है । विदेश से आने बाले यात्री में फ़ाहयन ,

ह्वेंसांग , इत्यिसंग एवं अलबरूनी का वर्णन भी प्रमुख है ।

चन्द्रगुप्त प्रथम (319-335) – गुप्त वंश का प्रथम प्रतापी राजा चन्द्रगुप्त प्रथम था , उन्होने सबसे पहले

महाराजाधिराज की उपाधि धारण की । उनका विवाह कुमार देवी से हुआ जो लिच्छवि वंश की राजकुकमारी

थी ।

समुद्रगुप्त (335-375) – समुद्रगुप्त गुप्त वंश का सबसे महत्वपूर्ण सम्राट था । हरिषेण ने  इनका वर्णन

प्रयाग प्रशस्ति में विस्तार से किया है । समुद्रगुप्त का नौ सेना बहुत ही विशाल था इसलिए इनको भारत का

नेपोलियन भी कहा जाता है । समुद्रगुप्त काला प्रेमी भी थे , उनके एक सिक्के में उनको  बिना के साथ दिखाया

गया है ।

चन्द्रगुप्त द्वितीय “विक्रमादित्य” (375-412) – चन्द्रगुप्त द्वितीय को एक महान विजेता कहा जाता है ।

इन्होने मालवा और गुजरात के शक राजा रुद्र सिंह तृतीय को हराया था ।

चन्द्रगुप्त द्वितीय  के बाद गोविंदगुप्त और कुमार गुप्त का क्रमश: शाशन रहा ।

स्क्न्द्गुप्त (455-467) – स्कंदगुप्त  गुप्त वंश का अंतिम महान शाशक था । इसने  हूणो को हराकर

विक्रमादित्य की उपाधि धारण की ।

स्कंदगुप्त के बाद 8 और शाशकों का वर्णन मिलता है , गुप्त वंश का अंतिम शाशक विष्णुगुप्त  था ।

जिसका विश्लेषण निम्नलिखित देखेंगे ।

सामाजिक व्यवस्था – गुप्त काल में सामाजिक  व्यवस्था ब्राह्मण प्रधान  सामाजिक  व्यवस्था बन

गई थी ।  नारद स्मृति में ब्राह्मणों के दिए गए विशेषाधिकार का वर्णन किया गया है । वर्ण उस

समय कई जातिया – उप जातीय में बट गई , इसका मुख्य कारण विदेशी आक्रमणकारी  वे

विजेता के रूप में  आए और उन्हें  क्षत्रीय  का स्थान मिला  । वे भारतीय समाज में घुल – मिल

गया । हुन एक विजेता के रूप में भारत आया था और उन्हें राजपूत के छतीस  कुलों में से एक

मान लिया गया । गुप्त काल में  शूद्रों कीस्थिति कुछ अच्छी थी , उन्हें रामायण , महाभारत ,

पुराण आदि को सुनने का अधिकार मिला । वे घरमें पुजा ,अनुष्ठान  आदि करने  का अधिकार था ।

उनकी गिनती कृषक में होने लगी थी । जबकी पहले इनका स्थान केवल तीनों वर्णो के सेवा में था,

तथा  इनको दास  या कृषक मजदूर  के रूप में ही इनकी पहचान थी ।

(gupt samrajya ko bharat)गुप्त काल में शूद्रो के भाती स्त्रियों भी को रामायण , महाभारत , पुराण

आदि को सुनने का अधिकार मिल गया  था । शूद्रों के स्त्रियों को अपने जीवन यापन करने के लिए अर्जन

कर सकती थी , परंतु उचे वर्ण की स्त्रियॉं को  यह स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं  थी । उच्च वर्ण की स्त्रियाँ से अपने

पति पर निर्भर हुआ करती थी । कुछ वर्णन इस प्रकार भी मिलते है की विवाह के समय  स्त्री के माता –

पिता एवं  सास ससुर द्वारा दिया गया उपहार को स्त्रीधन कहा जाता है । स्त्री इस धन को बेच  या

गिरवी रख सकती  थी ।

gupt samrajya ko bharat swarn yug kyu kaha jata hai
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व्यापारिक व्यवस्था –  गुप्त काल में व्यापार उन्नत था । गुप्त काल में जितनी  स्वर्ण मुद्राये जारी की

उतनाकिसी अन्य काल में नहीं हुई । गुप्त राजाओं के गुजरात के विजय के बाद कई चाँदी की मुद्रा

भी जारी किया स्थानीय  लेन-देन के लिए । ब्राह्मणो को जमीन दान दिया जाता था । इस से परती जमीन

तो आवाद हो गया । परंतु ये किसानो के हित के लिए अच्छा नहीं था । किसानो से वेगार लिए जाने लगा ।

कलाएं – चन्द्रगुप्त और समुद्रगुप्त कला के बहुत बड़े प्रेमी थे । समुद्रगुप्त के सिक्को में उन्हें वीणा लिए

दिखाया गया है । चन्द्रगुप्त के दरवार में नौ रत्न थे अर्थात नौ विद्वान थे । अमीर लोग अपने धन का कुछ

भाग  साहित्य साधना  और कला में लगे लोगो पर खर्च करते थे । उस समय चट्टान  काट कर मंदिर बनाए

गए , गुफा , बड़े – बड़े स्तूप आदि  बनाए गए । गुप्त काल के 2 मीटर ऊँची कांस्य की बोद्ध प्रतिमा बिहार

के सुल्तान पुर में पाई गई है । बोद्ध की 25 मीटर की ऊँची प्रतिमा फ़ाहियान के वर्णन में मिलता है जो प्रतिमा

आज ब्रिटेन के एक बर्मिंघम  म्यूजियम मे है । सारनाथ और मथुरा में बुद्ध के कई सुंदर  प्रतिमा पाई गई है ।

अजंता गुफा में भी बुद्ध के कई कलाकृतियाँ पाई जाती है । गुप्त के राजा ब्राह्मण धर्म का पोशाक था इसलिए

विष्णु , शिव एवं हिन्दू के अन्य देवी , देवता के मूर्ति पाये गए है ।

साहित्य – (gupt samrajya ko bharat)गुप्त काल का साहित्य अविस्मरणीय है , इस काल का

सबसे महत्वपूर्ण  साहित्य कालीदास का”अभिज्ञान्सकुंतलम ”  है , जिसमे  एक प्रतापी राजा भरत और

सकुनतला  की प्रेम कथा है , यह नाटक का अनुवाद यूरोपीय भाषा में भी किया गया है । इसके अलावा

शूद्रक के द्वारा लिखा गया मृक्ष्कटिका में एक ब्राह्मण  और वेश्या का प्रेम चित्रित है । गुप्त काल में संस्कृत

व्याकरण का भी विकाश हुआ पाणिनी और पतांजली ने संस्कृत का व्याकरण को अपने ग्रंथ द्वारा बहुत

योगदान दिया । गुप्त काल के साहित्य का विशेषता  यह थी की इनके साहित्य के अंत हमेशा सुखांत

हुआ करता था । उच्च वर्ग के लोग भिन्न भाषा का  प्रयोग करते थे । स्त्री और शूद्र प्राकृत भाषा का प्रयोग

करते थे एवं अन्य भद्र लोग संस्कृत भाषा में बात करते थे ।

विज्ञान  एवं प्रौधगिकी – उस समय के सबसे  के  बड़े गणितज्ञ आर्यभट्ट  ने अपनी पुस्तक आर्यभटीय

में विविध प्रकार के गणना का परिचय दिया है । उस समय में दाशमिक पद्धति का ज्ञान था ।

उस समय तकनीक के महकौशल का ज्ञान था । दिल्ली के महरोली का लोह स्तम्भ सोलह सौ वर्ष वित

जाने की बाद भी जंग नहीं लगा है । इस प्रकार गुप्त साम्राज्य  को स्वर्ण युग कहा जाता है ।

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